Wednesday, January 19, 2022

यहां जलती नहीं खुशहाली लाती है पराली, हिमाचल कुछ ऐसे करता है इस्तेमाल

दूसरे राज्यों के मुकाबले बेशक हिमाचल प्रदेश में धान का उत्पादन कम होता है, मगर पराली का इस्तेमाल जिस तरह से यहां होता है वह दूसरे राज्यों के लिए सबक है। छोटे और मंझोले किसान पराली को जलाते नहीं बल्कि पशुचारे, मशरूम उत्पादन और पैकिंग में उपयोग लाते हैं। बड़े किसान इसे प्रदेश के अन्य भागों में पशुपालकों को भिजवा देते हैं। बड़े राज्य अगर इसी तर्ज पर पराली का उपयोग करें तो वायु प्रदूषण कम होगा और पशुचारे की कमी भी पूरी हो जाएगी।

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हिमाचल में धान की खेती कांगड़ा, मंडी, ऊना, सिरमौर, सोलन व हमीरपुर जिलों में की जाती है। प्रदेश में करीब 72 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल में खेती होती है। कांगड़ा जिले में 36 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में धान की पैदावार होती है। हिमालय जैवसंपदा प्रौद्योगिकी संस्थान पालमपुर में पराली पर व्यापक शोध हुआ है। संस्थान के विज्ञानियों ने पराली से बायोडीजल तैयार किया है। यह तकनीक अभी बहुत महंगी है और इसकी लागत कम करने के लिए विशेषज्ञ शोध कर रहे हैं।

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पंजाब, हरियाणा सहित अन्य राज्यों में इन दिनों पराली जलाई जा रही है। यह पर्यावरण के लिए घातक है। इसे देखते हुए राज्य सरकारों ने खुले में पराली जलाने पर रोक लगाई है। साथ ही कड़े दंड का प्रावधान भी किया है। सामाजिक संगठन किसानों को जागरूक करने में जुटे हैं कि पराली का कोई और वैकल्पिक प्रयोग लाते हुए इसे जलाने से रोका जाए। मध्यप्रदेश में पराली से प्लेटें बनाकर प्लास्टिक की जगह इसे प्रयोग में करने की सलाह दी जा रही है। हिमाचल में मंझोले और छोटे किसानों के लिए पराली खुशहाली का काम करती है। किसान पशुओं को ठंड से बचाने के लिए उनके नीचे बिछाते हैं। साथ ही इसकी कंपोस्ट खाद भी बनाते हैं। प्रदेश में पशुचारे की समस्या रहती है और इसे पराली दूर कर देती है। दूसरे राज्य हिमाचल का मॉडल अपनाएंगे तो प्रदूषण का खतरा नहीं होगा।

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